प्रिय पाठकों,तेजी से परिवर्तन का दौर चल रहा है, सब अपने – अपने कामों में व्यस्त है और अपनी – अपनी इच्छाओं की पूर्ति के साथ साथ रोजमर्रा के संघर्ष से निपटने में लगे हैं।
पुरानी इमारतों का नवीनीकरण व पुरानी तकनीकों का आधुनिकीकरण हो रहा है, और साथ ही प्रकर्तिक और जलवायु परिवर्तन भी हो रहा है।और, आधुनिकता की इस दौड़ में महिलाओं का योगदान आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा है। 
किसी भी राष्ट्र की पारंपरिक संस्कृति और सभ्यता को संजोने का अधिकार प्राचीन काल से महिलाओं को मिलता आ रहा है और इस संदर्भ में उनका योगदान सदैव सराहनीय भी रहा है।
किन्तु, आज के दौर में परिवर्तन और परंपरा एक – दूसरे के पूरक से प्रतीत भी होने लगे हैं क्योंकि समाज(मुख्यतः पुरुष और बड़े बुजुर्ग) की अपेक्षा तो स्त्री से या यूं कहें कि एक पति या परिवार के बुजुर्गों की अपेक्षा तो अपनी पत्नी से पहले जैसी ही रही लेकिन आधुनिकता ने पत्नी को उस अपेक्षा पर खरा ना उतरने के लिए विवश सा कर दिया है। 
कैसे?? 
इसके लिए निम्नलिखित तथ्यों को समझने का प्रयास करते हैं(जो असल में एक पति की अपनी पत्नी से आज भी अपेक्षा है या यूं कहें कि – “पति के प्रति, पत्नी के प्रेम को व्यक्त करने के परंपरागत ढंग की लालसा है”) – 
1. परिवर्तन की इस होड़ में वो स्वयं को अकस्मात परिवर्तित ना करे, वो मुझसे, पहले जैसे ही प्रेम करे।
2. वह पहले की भांति वैसे ही सुबह – सवेरे हाथों में चाय की प्याली लेकर आए और अपने गीले बालों को मुझपर झटके, जैसे पहले झटकती थी और अपनी प्रीत व्यक्त करे।
3. वह जिस मुख से कोमल शब्दों के फूल बरसाती थी उसमें खंजर जैसी जुबान को शरण ना दे और अपने नैनों के वही कटीले तीर मुझ पर निरंतर चलती रहे जिससे मेरे मन में उसके प्रति प्रेम का दीपक, सदैव ज्वलंत रहे।
4. वह पारंपरिक रीति – रिवाजों को संजो कर रक्खे, माथे पर बिंदिया, मांग में सिंदूर लगाए, मुझे रिझाने के लिए कभी – कभी सोलह श्रृंगार करे।
5. वह छोटी – मोटी नौंक – झौंक मुझसे करे और अपना अल्हड़ स्वभाव जताए, मुझे सताए। अपने हाथों से वही पुराने ढंग से बनाए हलवे से घर – आंगन को महकाए, जिससे महक उठता था घर – आंगन वही घर की खीर बनाए, और सब परिजनों को लुभाए। बाहर के पकवानों को खाने पर, रोक लगाए।
6. पहले जैसा स्वाभाविक हो उसका रुसना – रूसाना, घर के बर्तन ना खटकाए। कुछ वैसा ही हो कि घर की बात घर तक ही रहे, बाहर ना जाए।
7. सुबह – सवेरे परिजनों की नींद, मंदिर की घंटी की टनटनाहट से खुले ना की दूरभाष यंत्र की ध्वनि से, और हां, ढके सिर से वह घर में शाम की ज्योत पहले जैसे ही जगाए।
8. हो सके तो, सर्दियों की धूप में पहले के जैसे छत पर हाथों में ऊन लिए कुछ बुने और गीत गुनगुनाए, आचार बनाए, पापड़ सुखाए। बसंत ऋतु में मेरी चरखी थामे और अपनी चूड़ियों की खनक सुनाए।
संस्कृति और सभ्यता को संजोने का उत्तरदायित्व मात्र महिलाओं का नहीं है अपितु इसमें पुरूषों का भी सहभागी होना अति आवश्यक है किन्तु पुनः वही पहल करने का साहस महिलाएं ही कर सकती हैं और किसी ने सत्य भी कहा है – “लेडीज फस्ट”।और, मैं कहूंगा कि – “लेडीज फोरमोस्ट”।
महिला दिवस की शुभकामनाएं।
                                  लेखक,                            अभिषेक शर्मा (Instant ABS)

Leave a comment