शिक्षक दिवस पर कोरोना काल में स्कूली शिक्षा से संबंधित जानकारी और स्कूल की कुछ भूली – बिसरी यादें।

दोस्तों,
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कोरोना महामारी के चलते सभी स्कूल – कॉलेज गत पांच महीनों से बंद पड़े हैं। शिक्षा का ढंग, रंग – रूप पूर्णतः परिवर्तित हो गया है।
अगर ऐसा ही हाल रहा तो पता नहीं यह परिवर्तन शिक्षा में ही नहीं वरन् हम सभी के पारिवारिक और दैनिक जीवन में क्या परिवर्तन लाएगा। इस बात की हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

विद्यार्थियों की दिनचर्या में यकायक बड़ा बदलाव आ गया है। खासतौर पर छोटी कक्षा के बच्चों की दिनचर्या पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ा है। देर रात सोना, सवेरे देर से उठना सामान्यतः देखने को मिल रहा है जो की अनियमितता और अनुशासनहीनता का कड़ा संदेश दे रहा है। अगर इसे बढ़ने से रोका नहीं गया तो इसके परिणाम बड़े ही नकारात्मक होंगे जिसका सीधा असर बच्चों के शैक्षिक, शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ेगा।

इसके अलावा हमें इस बात पर ध्यान देना भी अत्यंत आवश्यकता है कि इस समय बच्चे/विद्यार्थी अपने स्कूल की लगभग सभी भौतिक गतिविधियों से कोसो दूर हो गए हैं। ऐसे में उनकी उपर्युक्त तीनों विकास संबंधी गतिविधियों का ध्यान रखना बच्चों के अभिभावकों के लिए अनिवार्य है।

इसे समझने के लिए हमें बच्चों/विद्यार्थियों के स्कूल की दिनचर्या को स्मरण करना होगा। तो आईए मेरे संग उन स्कूली दिनों को याद करते हैं। इसके साथ – साथ हमें अपने स्कूल के दिनों की याद ताजा करने का एक स्रोत भी मिल जायेगा।

स्कूल में बच्चे की दिनचर्या प्रभात सभा (मॉर्निंग असेंबली) से शुरू होती थी। मलती आंखों के साथ बच्चे धीमे – धीमे अपनी ऊर्जा का विस्तार करते हुए, ऊबकाई लेते हुए अपने दिन को आगे बढ़ाते थे। जो अब नहीं हो रहा।
फिर एक – दो क्लास के बाद लंच का समय और उसी समय में छोटे – मोटे बचकाने खेल – कूद, झपटा – झपटी, दूसरे के टिफिन में ताका – झांकी और मिल बांटकर भोजन खाना, सब गुम है। क्लास के बीच में भूख लग पड़े तो टीचर से आंख बचाकर चुपके से टिफिन में से रोटी आदि खाना। यदि क्लास में पढ़ाई में मन न लगे तो कागज पर बेकार के चित्र, आकार, आदि बनाना। कभी परिधि यंत्र से कुछ नहीं तो मेज को खुरच देना। छुपन – छुपाई खेलना, कागज का रॉकेट बनाकर उड़ाना। जो अब घर पर तो कुछ भी करो तो तुरंत मां – पिताजी की डांट पड़ जाती है या फिर भाई – बहन यदि बड़े हैं तो अपना रोब जमाने लगते हैं। कोई संगी साथी मिलना मुश्किल ही लगता है इन दिनों।

इसके अलावा, यहां तक कि अब तो जेब खर्ची भी नहीं मिल रही। और बहुत – सी स्कूल की दिनचर्या संबंधित ऐसी बातें हैं जिसकी व्याख्या मैंने अपनी उपर्युक्त दी हुई कविता में की है।
जिसे सुनकर व देखकर आप कविता का आनंद लेते हुए स्कूल की कुछ भूली बिसरी यादें ताजा कर सकते हैं।

अस्तु:, हमें अपने – अपने बच्चों के स्कूल के समय के नियमित कार्यों को ध्यान में रखते हुए उन्हें वैसा ही वातावरण घर में देने का प्रयास करना चाहिए तभी कोरोना काल में शिक्षा की वास्तविक जीत होगी।

धन्यवाद 🙏🙏🙏

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