दोस्तों,
वैसे तो हमारे देश में विभिन्न प्रांतीय भाषाएं बोली जाती हैं किन्तु हिंदी भाषा को ही हमारी मातृ भाषा का पद प्राप्त है। और हो भी क्यों न? चूंकि, हमारी मातृ भाषा बहुत ही सरल, मधुर और प्रभावशाली शब्दावली से परिपूर्ण है।

किन्तु, पिछले कुछ बीते वर्षों से हम राष्ट्र – जन हमारी हिंदी भाषा की शुद्धता के मार्ग से भटकने लगे हैं और अंतरराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी को अपने वार्तालाप और यहां तक की लेखन तक में में हिंदी व उर्दू तक के साथ सम्मिलित कर बैठे हैं जो कि एक चिंतनीय विषय है।

अपने प्रांत, क्षेत्र, आदि की भाषा बोलना कोई अपराध नहीं है किन्तु अपनी मातृ भाषा के लेखन और वार्तालाप में उसकी शुद्धता को क्षीण करना दुखद है। हमें भाषा की शुद्धता के साथ – साथ, भाषा में प्रयोग होने वाली शब्दावली पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए और किसी से भी हिंदी भाषा में वार्तालाप या लेखन के समय अन्य भाषा का प्रयोग करने से बचना चाहिए।

दोस्तों,
मैं यहां तक कहना चाहूंगा कि हमारी मातृ भाषा हिन्दी, श्री मद्भागवत गीता के वचनों से कम नहीं होनी चाहिए अर्थात् हमें निम्नस्तरीय, ओछे, अश्लील, अभद्र, आदि शब्दों का प्रयोग अपने वार्तालाप में कदापि नहीं करने का प्रयास करना चाहिए और वार्तालाप या लेखन के समय भाषा में मधुरता का पुट सदैव समाहित रखना चाहिए। तभी हम एक उच्चस्तरीय भाषा शैली के साथ एक उच्चस्तरीय व्यक्तित्व का निर्माण कर सकेंगे।

हिन्दी – दिवस या यूं कहें कि हिंदी पर्व हमारे लिए किसी होली, दीवाली, दशहरा, बैसाखी, लोहड़ी, ईद, क्रिसमस, आदि त्यौहारों से कम नहीं होना चाहिए। हम सबको यह प्रयास करना अनिवार्य है कि हम हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाएं और अपनी मातृ भूमि और मातृ भाषा का गौरव बढ़ाएं।
भाषा के महत्व, हिन्दी के महत्व और वार्तालाप में भाषा के महत्व को बतलाने के लिए मैंने उपर्युक्त तीनों कविताओं की रचना की है। आशा करता हूं कि आप सभी का अनुमोदन मेरी रचनाओं को प्राप्त होगा।

जय हिन्द जय हिंदी🙏🙏🙏

Leave a comment