चाइनीज उत्पादों का बहिष्कार करने से भारत व भारतीयों को लाभ व हानि।

वैसे तो चीन का माल ज्यादा टिकता नहीं किन्तु बिकता बहुत है। चीन ने बीते 15 वर्षों में भारत में अपनी जड़ें बहुत मजबूत कर ली हैं। सस्ते उत्पाद होने के कारण व्यापारियों को भी चाइनीज उत्पाद बेचकर अच्छा मुनाफा होता है। वे आपसे मुंह मांगे दाम वसूलते हैं। सामान की कोई गारंटी भी नहीं देते। ऐसे में इस समय, चीनी उत्पादों के बहिष्कार से लोगों को क्या लाभ है व क्या हानि है, आईए विस्तार से जानते हैं –

  1. किसी भी तंत्र को अकस्मात रोकने से बहुत भारी क्षति होने की आशंका प्रबल हो जाती है और उसका विपरीत व प्रतिकूल प्रभाव भी सहन करना पड़ता है।
    मात्र बहिष्कार करने से कुछ नहीं होता बल्कि किसी भी उत्पाद या तंत्र का बहिष्कार करने से पूर्व सुनियोजित ढंग से उसके दुष्प्रभाव से बचने की योजना बनानी पड़ती है।
    जुमले छोड़ने और तुगलकी फरमान जारी करने से कोई लाभ नहीं है। अपने निजी लक्ष्य की अतिशीघ्र प्राप्ति करने के लिए आप सभी की जान दाव पर नहीं लगा सकते।
  2. चाइनीज उत्पाद न बेचने पर भारत में रोजगारी का संकट और अधिक गहरा जायेगा। जिससे निपटने के लिए कोई पुर्वनियोजित साधन या विकल्प नहीं है जिससे तत्काल होने वाली क्षति को रोका जा सके। मोबाइल कंपनियों, लाईट कंपनियों, प्लास्टिक उद्योग में कार्यरत लोगों, आदि पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा और बहुत से लोग बेरोजगार हो जाएंगे।
  3. भारत में व्यवसायी बड़ी मात्रा में चाइनीज उत्पाद खरीद कर बेचते हैं और बहुत भारी मात्रा में उसका भण्डारण करते हैं।
    अकस्मात बहिष्कार के निर्णय से उन्हें बड़ी मात्रा में नुकसान पहुंचेगा। बहुत से लोगों की बाजार में उधारी होती है या उन्होंने किसी से ऋण लिया होता है जो फंस जायेगा।
    इसके अतिरिक्त व्यापारी को नवीन व्यापार शुरू करने हेतु भी पूंजी चाहिए जो हो सकता है कि उसे ब्याज पर उठानी पड़े।
  4. यदि भारत किसी देश से उत्पाद या कच्चा माल आयात करता है तो उससे बने उत्पाद, आदि निर्यात भी करता है। इस निर्णय का दुष्प्रभाव आयात – निर्यात पर भी पड़ेगा।
  5. तत्काल प्रभाव से बहिष्कार और भ्रष्टाचार का समन्वय एक बड़ी आफत का संकेत दे रहा है जिसमें गरीब और माध्यम वर्ग का पिसना तय है। भारत एक विकासशील देश है न कि विकसित देश। विकासशील देशों की निर्भरता स्वयं से अधिक दूसरों पर होती है। आत्मनिर्भरता का ज्ञान देने वाले यह भी समझ लें कि भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए अब हमें 30 वर्ष से भी अधिक पीछे की उत्पाद निर्माण पद्धति को अपनाना होगा क्योंकि हमें मशीन नहीं, मेन – मशीन से काम चलाना होगा जिससे उत्पादों व कच्चे माल के दामों पर नकेल कसी रहे।

अभी की स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि, कठिनाइयां बढ़ने वाली हैं और भ्रष्टाचार का दानव लोगों को निगलने के लिए तैयार है।
कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था की डूबती हुई नैया में एक और छेद होने वाला है। और यदि, ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय जनता (मुख्यतः गरीब, किसान और माध्यम वर्ग) पाई – पाई का मोहताज होगा।

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